Maha Lakshmi Stotram महालक्ष्मी स्तोत्रम्

Maha Lakshmi Stotram महालक्ष्मी स्तोत्रम्

Author: Rajat Jain January 28, 2026 Duration: 8:30

// श्री महालक्ष्मी स्तोत्र //

श्री गणेशाय नमः !!


पद्मे पद्मपलाशाक्षि जय त्वं श्रीपतिप्रिये ।

जयमातर्महालक्ष्मि संसारार्णवतारिणि ॥१॥


महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि ।

हरिप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ॥२॥


पद्मालये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं च सर्वदे ।

सर्वभूताहितार्थाय वसुवृष्टिं सदा कुरु ॥३॥


जगन्मातर्नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ।

दयावति नमस्तुभ्यं विश्वेश्वरि नमोऽस्तुते ॥४॥


नमः क्षीरार्णवसुते नमस्त्रैलोक्यधारिणि ।

वसुवृष्टे नमस्तुभ्यं रक्ष मां शरणागतम् ॥५॥


रक्ष त्वंदेवदेवेशि देवदेवस्य वल्लभे ।

दारिद्र्यात्त्राहि मां लक्ष्मि कृपां कुरु ममोपरि ॥६॥


नमस्त्रैलोक्यजननि नमस्त्रैलोक्यपावनि ।

ब्रह्मादयो नम्म्ति त्वां जगदानंददायिनि ॥७॥


विष्णुप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं जगद्धिते ।

आर्तिहंत्रि नमस्तुभ्यं समृद्धिं कुरु मे सदा ॥८॥


अब्जवासे नमस्तुभ्यं चपलायै नमो नमः ।

चंचलायै नमस्तुभ्यं ललितायै नमो नमः ॥९॥


नमः प्रद्युम्रजननि मातस्तुभ्यं नमो नमः ।

परिपालय भो मातर्मा तुभ्यं शरणागतम् ॥१०॥


शर्ण्ये त्वां प्रपन्नोऽस्मि कमले कमलालये ।

त्राहि त्राहि महालक्ष्मि परित्राणपरायणे ॥११॥


पांडित्यं शोभते नैव न शोभंति गुणा नरे ।

शीलत्वं नैव शोभेत महालक्ष्मि त्वयाविना ॥१२॥


तावद्धिराजते रूपं तावच्छीलं विराजते ।

तावद्गुणा नराणां च यावल्लक्ष्मीः प्रसीदति ॥१३॥


लक्ष्मि त्वयालंकृतमानवा ये पापैर्विमुक्तानृपलोकमान्याः ।

गुणैर्विहीना गुणिनो भवंति दुःशीलिनः शीलवतां वरिष्ठाः ॥१४॥


लक्ष्मीर्भूषयते रूपं लक्ष्मीर्भूषयते कुलम् ।

लक्ष्मीर्भूषयते विद्यां सर्वाल्लक्ष्मीर्विशिष्यते ॥१५॥


अस्माभिस्तव रूपलक्षणगुणान्वक्तुः कथं शक्यते ।

मातर्मा परिपाहि विश्वजननि कृत्वा ममेष्टं ध्रुवम् ॥१६॥


दैन्यार्तिभीतं भवतापपीडितं धनैर्विहीनं तव पार्श्वमागतम् ।

कृपानिधित्वान्मम लक्ष्मि सत्वरं धनप्रदानाद्धननायक्म कुरु ॥१७॥


मां विलोक्य जननि हरिप्रिये निर्धनं तव समीपमागतम् ।

देहि मे झटिति लक्ष्मि कराग्रं वस्त्रकांचनवरान्नमद्भुतम् ॥१८॥


त्वमेव जननी लक्ष्मि पिता लक्ष्मि त्वमेव च ।

भ्राता त्वं च सखा लक्ष्मि विद्या लक्ष्मि त्वमेव च ॥१९॥


त्राहि त्राहि महालक्ष्मि त्राहि त्राहि सुरेश्वरि ।

त्राहि त्राहि जगन्मातर्दारिद्र्यात्त्राहिवेगतः ॥२०॥


नमस्तुभ्यं जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं नमो नमः ।

धर्माधारे नमस्तुभ्यं नमः संपत्तिदायिनि ॥२१॥


दारिद्र्यार्णवामग्नोऽहं निमग्नोऽहं रसातले ।

मज्जंतं मां करे धृत्वा सुद्धर त्वं रमे द्रुतम् ॥२२॥


किं लक्ष्मि बहुनोक्तेन जल्पितेन पुनः पुनः ।

अनन्मे शरण नास्ति सत्यं सत्यं हरिप्रिये ॥२३॥


एतच्छुत्वाऽगस्तिवाक्यं ह्रष्यमाणा हरिप्रिया ।

उवाच मधुरां वाणीं तुष्टाऽहं तव सर्वदा ॥२४॥


लक्ष्मीरुवाच । यत्त्वयोक्तमिदं स्तोत्रं यः पठिष्यति मानवः ।

श्रृणोति च महाबागस्तस्याहं वशवर्तिनी ॥२५॥


नित्यं पठति यो भक्त्या त्वलक्ष्मीस्तस्य नश्यति ।

ऋणं च नश्यते तीव्रं वियोगं नैव पश्यति ॥२६॥


यः पठेत्प्रातरुत्थाय श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।

गृहे तस्य सदा स्थास्ये नित्यं श्रीपतिनासह ॥२७॥


सुखसौभाग्यसंपन्नो मनस्वी बुद्धिमान् भवेत् ।

पुत्रवान् गुणवान् श्रेष्ठो भोगभोक्ता च मानवः ॥२८॥


इदं स्तोत्रं महापुण्यं लक्ष्म्यगस्तिप्रकीर्तितम् ।

विष्णुप्रसादजननं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥२९॥


राजद्वारे जयश्चैव शत्रोश्चैव पराजयः ।

भूतप्रेतपिशाचानां व्याघ्राणां न भयं तथा ॥३०॥


न शस्त्रानलतो यौधाद्भयं तस्य प्रजायते ।

दुर्वृत्तानां च पापानां बहुहानिकरं परम् ॥३१॥


मंदुराकरिशालासु गवां गोष्ठे समाहितः ।

पठेत्तद्दोषशांत्यर्थं महापातकनाशनम् ॥३२॥


सर्वसौख्यकरं नृणामायुरारोग्यदं तथा ।

अगस्तिमुनिना प्रोक्तं प्रजानां हितकाम्यया ॥३३॥


इत्यगस्तिविरचितं श्रीमहालक्ष्मीस्तोत्रं संपूर्णम् ।।


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Author: Language: Hindi Episodes: 50

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